Wednesday, 23 November 2011

छत्तीसगढ़ी गजल , "मोर मन के पीरा"

मोर मन के पीरा
  
अच्छाई उपर बुराई जीतगें।
आज फिर सहर म एक इमानदार पीटगे।

जेन रिपोट लिखाइस तेने होगे अंदर
,
रुपिया के बल म सच झुठ म बदलगे।

बुधारु ह जमीन ल नइ बेचव कहि दिस
,
फेर फर्जी तरीका ले वोखर जमीन बीकगे।

छिनइया छीनत हे लुटइया लुटत हे बिना काही डर,
फेर होवत नइहे कुछू कारवाई मोर त सच्चाई ले भरोसा उठगे।
सुने हव समारु के खेत म प्लांट लगइया हे बड़ रोत हे,
न जाने अतके कतकों किसान हे जेन फोकट म लुटगे।
मंगलु ह आसमान कोति देख भगवान ल कहत ये का होथ हे,

नइ चाहत घलोक हमार खेत-खार,घर-द्वार सब छीनगे।
मुआवजा के मरहम पीरा ल कइसे हरय घाव बड़ गहरा हे,
अब तो केवल सरीरे ल जान जीव हव तो कब के छुटगे।

चिरई-चिरगुन,सुवना-परेवा,बर-पीपर,अमरइया-छइहां,
खोजे नइ मिले, काबर सुने हव गांव उजड़ के सहर बनगे।

वैभव शिव पाण्डेय क्रांति

Monday, 22 August 2011

क्या मैं अन्ना हूँ...

क्या मैं अन्ना हूँ
...पैंसो की चमक ने चुराया फर्ज ए नमक खुन हुआ इमान का ।
भूलाया मातृभूमि का कर्ज,खुद बने बेईमान साथ दिया कई बार बेईमान का।
कचोटते रहते गर खुद के जहन को,तो बचा लेते शर्म का पानी।
तकदीरें संवर चुकी होती,न वक्त जाया होता यूं बेमानी।
सुबह का भूला गर शाम को लौटे,तो उसे भूला नहीं कहते,फर्ज भूलने में आज हमने अपना सबकुछ गवां दिया।
काश शाम को लौट आये होते,पर लौटने में हमने एक अरसा लगा दिया।
आज अंधरो में गंवाए बिते पलो का, चुकाना पुरा लगान हैं।
अब मकसद से ना भटकना क्योंकि भीड़ में खुद को अन्ना कहना बेहद आसान हैं।
हुंकार भरता नारे लगाता, क्या मैं उदय होते भारत की तमन्ना हूं।
बुढ़े जहन में फौलाद पालता, क्या मैं भारता का अगला अन्ना हूँ॥
शशिकांत तिवारी ,भिलाई (..)

एक पैरोडी, अन्ना का तो ये अनशन

एक पैरोडी
, अन्ना का तो ये अनशनअन्ना का तो ये अनशन ,सोये सरकार को जगाना हैं
बनाके लोकपाल हमें,भ्रष्टाचार को मिटाना हैं।
अन्ना का तो ....
बापू तेरे भारत का, अन्ना तो हैं सच्चा वीर.इस वीर के पीछे, आज सारा जमाना हैं।
अन्ना का तो...
सोनिया तेरे यूपीए का ,मनमोहन तो एक कठपुतली,तुने खुब नचाया हैं
अब हम सबको भी नचाना हैं।
अन्ना का तो...
अन्ना तेरी आंधी से
ये सरकार हिल जाएगी
फिर संसद को तो
भ्रष्टाचारियों से मुक्त कराना हैं।
अन्ना का तो....
वैभव शिव पाण्डेय , भिलाई(..)

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